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Hazrat Abu Huraira ( R Z)| जिसने 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहा, उसको यह कलिमा एक-न-एक दिन ज़रूर

 हजरत अबू हुरैरह ( R Z)से रिवायत है कि रसूलुल्लाह

 ( S W) ने इर्शाद फ़रमाया :

जिसने 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहा, उसको यह कलिमा एक-न-एक दिन ज़रूर

फ़ायदा देगा, (नजात दिलाएगा), अगरचे उसको कुछ-न-कुछ सज़ा पहले भुगतना पड़े 

(बज़्ज़ार, तबरानी, तर्गीब)

Hazrat Abu Huraira ( R Z)| जिसने 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहा, उसको यह कलिमा एक-न-एक दिन ज़रूर

10.

हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (R Z) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (S W) ने इर्शाद

फ़रमाया: क्या मैं तुम्हें वह वसीयत न बताऊं जो (हजरत) नूह  ( A S)ने अपने बेटे


को की थी? सहाबा (R Z)ने अर्ज किया : जरूर बताइए। इर्शाद फ़रमाया : (हजरत)


नूह (A S) ने अपने बेटे को वसीयत में फ़रमायाः मेरे बेटे! तुम को दो काम करने की

वसीयत करता हूं और दो कामों से रोकता हूं। एक तो मैं तुम्हें ला इला-ह इल्लल्लाह

के कहने का हुक्म देता हूं, क्योंकि अगर यह कलिमा एक पलड़े में रख दिया जाए

और तमाम आसमान व जमीन को एक पलड़े में रख दिया जाए तो कलिमा वाला

पलड़ा झुक जाएगा और अगर तमाम आसमान व जमीन का एक घेरा हो जाए, तो

भी यह कलिमा इस घेरे को तोड़ कर अल्लाह तआला तक पहुंच कर रहेगा। दूसरी

चीज जिसका हुक्म देता हूं वह 'सुब्हानल्लाहिल अज़ीमि व बिहम्दिहि' का पढ़ना

है, क्योंकि यह तमाम मख़्लूक़ की इबादत है और इसी की बरकत से मख़लूक़ात को

रोजी दी जाती है। और मैं तुम को दो बातों से रोकता हूं शिर्क से और तकब्बुर से,

क्योंकि ये दोनों बुराइयां बन्दे को अल्लाह से दूर कर देती हैं।

(बज़्ज़ार, मज्मउज्ज़वाइद)

Hazrat Abu Huraira ( R Z)| जिसने 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहा, उसको यह कलिमा एक-न-एक दिन ज़रूर


11. हज़रत तलहा बिन उबैदुल्लाह (R Z) से रिवायत है कि नबी करीम (S W) ने इर्शाद

फ़रमाया: मैं एक ऐसा कलिमा जानता हूं, जिसे ऐसा शख़्स पढ़े जिसकी मौत का

वक़्त क़रीब हो तो उसकी रूह जिस्म से निकलते वक़्त इस कलिमा की बदौलत जरूर

राहत पाएगी और वह कलिमा उसके लिए क़ियामत के दिन नूर होगा। (वह कलिमा

'ला इला-ह इल्लल्लाह' है )

(अबू याला, मज्मउज़्ज़वाइद)

12.

हजरत अनस  (R Z)से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (S W) ने इर्शाद फ़रमायाः हर वह

शख़्स जहन्नम से निकलेगा जिसने ला इला-ह इल्लल्लाह कहा होगा और उसके

दिल में एक जौ के वज़न के बराबर भी भलाई होगी यानी ईमान होगा, फिर वह शख़्त 

जहन्नम से निकलेगा जिस ने ला इला-ह इल्लल्लाह कहा होगा और उसके दिल में

गंदुम के दाने के बराबर भी खैर होगी, यानी ईमान होगा, फिर हर वह शख़्स जहन्नम

से निकलेगा जिसने ला इला-ह इल्लल्लाह कहा होगा और उसके दिल में ज़र्रा

बराबर भी ख़ैर होगी। (बुखारी)

13. हज़रत मिक़दाद बिन अस्वद (R Z) फ़रमाते हैं कि मैंने नबी करीम (S W) को यह

इर्शाद फ़रमाते हुए सुना : ज़मीन की सतह पर किसी शहर, गांव, सेहरा का कोई घर

या ख़ेमा ऐसा बाक़ी नहीं रहेगा, जहां अल्लाह तआला इस्लाम के कलिमा को दाख़िल

न फ़रमा दें। मानने वाले को कलिमा वाला बना कर इज़्ज़त देंगे, न मानने वाले को

ज़लील फ़रमाएंगे, फिर वे मुसलमानों के मातहत बनकर रहेंगे। (मुस्नद अहमद)

14.

हज़रत इब्ने शिमासा महरी रहमतुल्लाह अलैह से रिवायत है कि हम हजरत

अमरु बिन आस (R Z) के पास उनके आख़िरी वक़्त में मौजूद थे। वह ज़ार-व-क़तार रो

रहे थे और दीवार की तरफ़ अपना रुख़ किए हुए थे। उनके साहिबजादे उनको

तसल्ली देने के लिए कहने लगे, अब्बा जान! क्या नबी करीम (S W) ने आप को फ़्लां

बशारत नहीं दी थी? क्या रसूलुल्लाह (S W)

ने आप को फ़्लां बशारत नहीं दी थी? यानी आपको तो नबी करीम (s W)

ने बड़ी-बड़ी बशारतें दी हैं। यह सुनकर उन्होंने (दीवार

की तरफ़ से) अपना रुख़ बदला और फ़रमाया, सबसे अफ़ज़ल चीज़ जो हम ने

(आख़िरत के लिए) तैयार की है वह इस बात की शहादत है कि अल्लाह तआला के

सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद  (S W)अल्लाह के रसूल हैं। मेरी ज़िन्दगी के तीन

दौर गुज़रे हैं। एक दौर तो वह था जबकि रसूलुल्लाह

 (S W) से बुग्ज़ रखने वाला मुझसे

ज़्यादा कोई और शख़्स न था और जबकि मेरी सबसे बड़ी तमन्ना यह थी कि किसी

तरह आप पर मेरा क़ाबू चल जाए तो मैं आप को मार डालूं । यह तो मेरी जिन्दगी

का सबसे बतदर दौर था, (ख़ुदा न ख़्वास्ता) मैं इस हाल पर मर जाता तो यक़ीनन

दौज़ख़ी होता। इसके बाद जब अल्लाह तआला ने मेरे दिल में इस्लाम का हक़ होना

डाल दिया तो मैं आप के पास आया और मैंने अर्ज किया, अपना मुबारक हाथ

बढ़ाइए ताकि मैं आप से बैअत करूं। आप(S W) ने अपना हाथ मुबारक बढ़ा दिया।

मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया। आपने फ़रमाया, अमरु यह क्या? मैंने अर्ज़ किया,

मैं कुछ शर्त लगाना चाहता हूं। फ़रमाया: क्या शर्त लगाना चाहते हो? मैंने कहा, यह

कि मेरे सब गुनाह माफ़ हो जाएं। आप (S W)ने इर्शाद फ़रमाया : अमरु! क्या तुम्हें ख़बर

नहीं कि इस्लाम तो कुफ्र की ज़िन्दगी के गुनाहों का तमाम क़िस्सा ही पाक कर देता

है; और हिजरत भी पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर देती है; और हज भी पिछले सब

गुनाह ख़त्म कर देता है। यह दौर वह था जबकि आपसे ज्यादा प्यारा, आपसे ज़्यादा

बुजुर्ग व बरतर मेरी नज़र में कोई और न था। आपकी अजमत की वजह से मेरी यह

ताब न थी कि कभी आप को नज़र भर कर देख सकता, अगर मुझसे आपकी सूरत

मुबारक पूछी जाए मैं कुछ नहीं बता सकता, क्योंकि मैंने कभी पूरी तरह आपको

देखा ही नहीं। काश! अगर मैं इस हाल पर मर जाता तो उम्मीद है कि जन्नती होता।

फिर हम कुछ चीज़ों के मुतवल्ली और जिम्मदार बने और नहीं कह सकते कि हमारा

हाल उन चीजों में क्या रहा (यह मेरी जिन्दगी का तीसरा दौर था)। अच्छा देखो, जब 

मेरी वफ़ात हो जाए तो मेरे (जनाजे के) साथ कोई वावेला और शोर व शग़ब करने

वाली औरत न जाने पाए, न (जमाना जाहिलियत की तरह) आग मेरे जनाज़े के साथ

हो। जब मुझे दफ़न कर चुको तो मेरी क़ब्र पर अच्छी तरह मिट्टी डालना और जब

(फ़ारिग़ हो जाओ) तो मेरी क़ब्र के पास इतनी देर ठहरना जितनी देर में ऊंट जबह

करके उसका गोश्त तक़सीम किया जाता है, ताकि तुम्हारी वजह से मेरा दिल लगा

रहे और मुझे मालूम हो जाए कि मैं अपने रब के भेजे हुए फ़रिश्तों के सवालात के

जवाबात क्या देता हूं।

(मुस्लिम)

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