अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह (S W) से इर्शाद फ़रमाया: आप फ़रमा दीजिए
कि बेशक मेरी नमाज और मेरी हर इबादत, मेरा जीना और मरना, सब कुछ
अल्लाह तआला ही के लिए है जो सारे जहां के पालने वाले हैं।
अन्आम 162)
नबी करीम (S W) की हदीसें
1.
हजरत अबू हुरैरह ( R Z)से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (S W)
ने इर्शाद फ़रमायाः
ईमान की सत्तर से ज़्यादा शाखें हैं। उनमें सबसे अफ़ज़ल शाख़ 'ला इला-ह
इल्लल्लाह' का कहना है और अदना शाख़ तकलीफ़ देने वाली चीजों का रास्ते से
हटाना है और हया ईमान की एक (अहम) शाख़ है ।
(मुस्लिम)
رواه احمد 6/1
2. हज़रत अबू बक्र (R Z) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (S W) ने इर्शाद फ़रमाया
जो शख़्स इस कलिमा को क़ुबूल कर ले जिस को मैंने अपने चचा (अबू तालिब) पर
(उनके इन्तिक़ाल के वक़्त) पेश किया था और उन्होंने उसे रद्द कर दिया था, वह
कलिमा उस शख़्स के लिए नजात (का जरिया) है।
(मुस्नद अहमद)
3.हज़रत अबू हुरैरह (R Z)
से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ( S W)ने इर्शाद फ़रमाया
‘अपने ईमान को ताज़ा करते रहा करो।' अर्ज़ किया गया : ऐ अल्लाह के रसूल (S W)
हम अपने ईमान को किस तरह ताजा करें? इर्शाद फ़रमायाः ला इला-ह इल्लल्लाह को कसरत से कहते रहा करो ।
(मुस्नद अहमद, तबरानी, तर्गीब)
غریب، باب ماجاء ان دعوة المسلم مستجابة، رقم: ۳۳۸۳
4.हजरत जाबिर बिन अब्दुल्लाह ( R Z) फ़रमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह ( S W) को यह
इर्शाद फ़रमाते हुए सुना तमाम अजकार में सबसे अफ़जल जिक्र ला इला-ह
इज्जल्लाह है और तमाम दुआओं में सबसे अफ़ज़ल दुआ अलहम्दु लिल्लाह है।
(तिर्मिजी)
फायदा:
ला इला-ह इल्लल्लाह सबसे अफ़ज़ल इसलिए है कि सारे दीन का
दार-व-मदार ही इस पर है। इसके बग़ैर न ईमान सही होता है और न
कोई मुसलमान बनता है। अल-हम्दु लिल्लाह को अफ़ज़ल दुआ इसलिए
फ़रमाया गया कि करीम की तारीफ़ का मतलब सवाल ही होता है और दुआ अल्लाह तआला से सवाल करने का नाम है।
(मजाहिरे हक़)
5.हजरत अबू हुरैरह फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह (S W) ने इर्शाद फ़रमाया, (जब)
कोई बन्दा दिल के इख़्लास के साथ ला इला-ह इल्लल्लाह कहता है, तो इस कलिमा
के लिए यक़ीनी तौर पर आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, यहां तक कि यह
कलिमा सीधा अर्श तक पहुंचता है, यानी फ़ौरन कुबूल होता है, बशर्तेकि वह कलिमा
कहने वाला कबीरा गुनाहों से बचता हो।'
(तिर्मिजी)
फायदा
इख़्लास के साथ कहना यह है कि इसमें रिया और निफ़ाक़ न हो। कबीरा
गुनाहों से बचने की शर्त जल्द क़ुबूल होने के लिए है और अगर क
गुनाहें के साथ भी कहा जाए तो नफ़ा और सवाब से उस वक़्त भी ख़ाली नहीं।
(मिरक्रात)

