ईमान
'ईमान' लुगत में किसी की बात को किसी के एतिमाद पर
यकीनी तौर से मान लेने का नाम है और दीन की ख़ास इस्तिलाह
भें
रसूल की ख़बर को बगैर मुशाहदा के महज़ रसूल के एतिमाद
पर यकीनी तौर से मान लेने का नाम 'ईमान' है।
क़ुरआनी आयतें
قال الله تعالى: (وما أرسلنا من قبلك من رسول إلا نوحي إليه أنه لا إله إلا أنا فاعبدون
الا نبياء: ٢٥]
अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह ( S W) से इर्शाद फ़रमाया: 'और हमने आपसे ने
पहले कोई ऐसा पैग़म्बर नहीं भेजा जिसके पास हम ने यह वस्य न भेजी हो
कि मेरे सिवा कोई माबूद नहीं, इसलिए मेरी ही इबादत करो।' (अम्बिया : 25)
وقال تعالى: «إنما المؤمنون الذين إذا ذكر الله وجلت قلوبهم وإذا تليت
عليهم اينه زادتهم إيمانا وعلى ربهم يتوكلون»
[Alnafal 2]
अल्लाह तआला का इर्शाद है : 'ईमान वाले तो वही हैं कि जब अल्लाह
तआला का नाम लिया जाता है तो उनके दिल डर जाते हैं और जब अल्लाह
तआला की आयतें उनको पढ़कर सुनाई जाती हैं तो वे आयतें उनके ईमान
को क़वी तर कर देती हैं और वें अपने रब ही पर तवक्कुल करते हैं।'
( अन्फ़ाल: 2)
وقال تعالى: «فأما الذين آمنوا بالله واعتصموا به فسيدجِلُهُم في رحمة منه
وفضل لا ويهديهم إليه صراط مستقيماء
[النساء :١٧٥].
अल्लाह तआला का इर्शाद है : 'जो लोग अल्लाह तआला पर ईमान लाए
और अच्छी तरह अल्लाह तआला से ताल्लुक़ पैदा कर लिया, तो अल्लाह
तआला अनक़रीब ऐसे लोगों को अपनी रहमत और फ़ज़्ल में दाख़िल करेंगे
और उन्हें अपने तक पहुंचने का सीधा रास्ता दिखाएंगे (जहां उन्हें रहनुमाई
की जरूरत पेश आएगी, उनकी दस्तगीरी फ़रमाएंगे) ।' (निसा : 175)
وقال تعالى: «إنّـا لـنـصـررسلنا والذين آمنوا في الحيوة الدنيا ويوم يقوم
الاشهاده [01:المؤ من]
अल्लाह तआला का इर्शाद है: 'बेशक हम अपने रसूलों और ईमान वालों की
दुनिया की ज़िन्दगी में भी मदद करते हैं और क़ियामत के दिन भी मदद
करेंगे, जिस दिन आमाल लिखने वाले फ़रिश्ते गवाही देने खड़े होंगे।
(मोमिन : 51 )
وقال تعالى: «الذين آمنوا ولم يلبسوا إيمانهم بظلم أولئك لهم الأمن وهم
مهتدون »
[ا لا نعام: ٨٢ ]
अल्लाह तआला का इर्शाद है : 'जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अपने
ईमान में शिर्क की मिलावट नहीं की, अम्न इन्ही के लिए है और यही लोग
हिदायत पर हैं।'
( अन्आम 82 )
وقال تعالى: (والذين آمنوا أشد حبا لله
[ا لبقرة:١٦٥]
अल्लाह तआला का इर्शाद है: 'और ईमान वालों को तो अल्लाह तआला ही
से ज़्यादा मुहब्बत होती है।'
(बकरः 165)
وقال تعالى: ( قل إن صلاتي ونسكي ومحياي ومماتي لله رب العلمين»
الانعام: ١٦٢]

