तालीफ
हजरत मौलाना
मुहम्मद यूसुफ कांधलवी ( R H)
तरतीब व तर्जुमा
हजरत मौलाना
मुहम्मद सअद कांधलवी
अल्लाह तआला का इर्शाद है :
لَقَدْ مَنَّ الله عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُوْلاً مِّنْ أَنفُسِهِمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ اَيٰتِهٖ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الكتب وَالْحِكْمَةَ ، وَإِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلُ لَفِي ضَلَلٍ مُّبِيْنٍ .
(अल इमरान 164)
तर्जुमा :
हकीकत में अल्लाह तआला ने ईमान वालों पर बड़ा एहसान फ़रमाया है जब कि उनही में से, उनमें एक ऐसा (अज़ीमुश्शान) रसूल भेजा कि (इन्सानों में से होने की वजह से उनके आली सिफात से लोग बेतकल्लुफ़ फायदा उठाते हैं) वह रसूल उन को अल्लाह तआला की आयतें पढ़-पढ़ कर सुनाते हैं (आयाते कुरआनिया के ज़रिये उनको दावत देते हैं, नसीहत करते हैं) उनके अख़लाक़ बनाते और सवारते हैं, और अल्लाह तआला की किताब और अपनी सुन्नत और तरीके की तालीम देते हैं, बिलाशुबहा इन रसूल की तशरीफ़ आवरी से कब्ल यह लोग खुली गुमराही में मुब्तला थे।
(आले इमरान)
दर्जबाला आयत के ज़ैल में और इस मौजूअ पर हजरत मौलाना सैयद सुलैमान नदवी रहमतुल्लाह अलैह ने “हज़रत मौलाना मुहम्मद इलयास रहमतुल्लाह अलैह और उनकी दीनी दावत" के मुकद्दमे में तहरीर फरमाया है कि रसूले करीम अलैहिस्सलातु वत्तस्लीम को कारे नुबुव्वत के यह फ्राइज़ अता हुए हैं, तिलावते कुरआने करीम और अहादीसे सहीहा के नुसूस से यह साबित है कि ख़ातिमुन्नबीयीन (S W ) की उम्मत अपने नबी के इत्तिबाअ में उममे आलम की तरफ मबऊस है। हक तआला शानुहू का इशीद है :
كُنتُمْ خَيُرَ اُمَّةٍ اُخْرِجَتٌ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ. ( अल इमरान 110)
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तर्जुमा :
"ऐ मुसलमानो! तुम बेहतरीन उम्मत हो जो लोगों के लिए ज़ाहिर की गई, अच्छे कामों को बताते हो और बुरे कामों से रोकते हो" ।
उम्मते मुस्लिमा फराइज़े नुबुव्वत में से दावत खेर और अम्र विल्ममारूफ और नही अनिलमुन्कर में नबी की जानशीन है। इसलिए रसूले करीम अलैहिस्सलातु वत्तस्लीम को कारे नुबुव्वत के जो फराइज़ अता हुए हैं, तिलावते आयात के जरीये दावत, राजकिय और तालीमे किताब व हिकमत, यह आमाल उम्मते मुस्लिमः के भी ज़िम्मे आ गये, चुनाँचे रसूलुल्लाह ( S W ) ने अपनी उम्मत को दावत, तालीम व तअल्लुम ज़िक्र व इबादत पर जान व माल खर्च करने वाला बनाया। इन आमाल को दूसरे अशगाल पर तरजीह की गई और हर हाल में इन आमाल की मश्क कराई गई इन आमाल में इन्हिमाक के साथ तकालीफ़ और शदाइद पर सब सिखाया गया; दूसरों को नफा पहुँचने के लिऐ अपना जान व माल लगाने वाला बनाया गया और "वजाहिदू फिल्लाहि हक क जिहादिः" "और अल्लाह तआला के दीन के लिए मेहनत और कोशिश किया करो जैसा मेहनत करने का हक है, की तामील में नबियों वाले मिज़ाज पर रियाज़त व मुजाहिदा और कुर्बानी व ईसार के वह नक्शे तैयार हुए जिन में उम्मत का आला तरीन मजमूअः वुजूद में आया, जिस दौर में नबी-ए-करीम ( S W) वाले यह आमाल मजमूई तौर पर उमूमे उम्मत में ज़िन्दा रहे उस दौर के लिये खैरुलक़रून की शहादत दी गई।
फिर करनन बाद कर्निन ख़वास ने यानी अकाविरे उम्मत ने इन नब्वी फ्राइज़ की अदायगी में पूरी तवज्जुह और कोशिश मवज़ूल फरमाई और उन्हीं के मुजाहिदात का नूर है, जिससे काशाना-ए-इस्लाम में रौशनी है।
इस दौर में अल्लाह जल्ल ल शाहू ने हज़रत मौलाना मुहम्मद इलयास रहमतुल्लाह अलैह के दिल में दीन के मिटने पर सोज़ व फिक व बेचैनी और उम्मत के लिए दर्द- कुढ़न और गुम इस दर्जे में भर दिया था, जो उनके वक्त के अकाबिर की नज़र में अपनी मिसाल आप था। वह हर वक्त ( S W )مَا جَاءَ بِهِ النَّبِيُّ
جَمِيعُ नबी-ए-करीम जो तरीके अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की तरफ से लाये हैं उन सब को सारे आलम में ज़िन्दा करने के लिए मुज़तरिब रहते थे और वह इस बात के पूरे जज़्म के साथ दाई थे कि इया-ए दीन के लिए जिद व जुहद में रसूलुल्लाह ( S W ) का तरीका
ज़िन्दा हो। ऐसे दाई तैयार हों जो अपने इल्म व अमल, फिक्र व नज़र तरीके दावत और ज़ौक़ व हाल में अम्बिया अलैहिमुस्सलाम और खुसूसन मुहम्मद से खास मुनास्वत रखते हों। सिहते ईमान और ज़ाहिरी अमले सालेह के साथ उन के बातिनी अहवाल भी मिनहाजे नुबुव्वत पर हों, मुहब्बते इलाही, ख़ुशिय्यते इलाही, तअल्लुक मअल्लाह की कैफियत हो, अख़्लाक़ व आदात व शमाइल में इत्तिवान् सुनने नब्बी का इहतमाम हो । हुब्बु लिल्लाह, बुग्जु लिल्लाह, राकृत व रहमत बिलमुस्लिमीन और शफ़क्त अलल्खल्क उनकी दावत का मुहर्रिक हो, और अम्बिया अलैहिस्सलाम के बार-बार दुहराए हुए उसूल के मुताबिक सिवाए अज इलाही की तलब के कोई मक़सूद न हो, अल्लाह तआला की राह में जान व माल बेक़ीमत करने का शौक़ उन्हें खींचे-खींचे लिये फिरता हो और जाह व मन्सब, माल व दौलत, इज़्ज़त व शुहरत नाम व नुमूद और जाती आराम व आसाइश का कोई ख़्याल राह में मोनअ न हो, उनका बैठना, उठना, बोलना, चालना गरज़ उन की जिन्दगी की हर जुंबिश व हरकत उसी एक सम्त में सिमट कर रह जाये।
जिद्द व जुहद में रसूलुल्लाह ( S W) का तरीका ज़िन्दा करने और ज़िन्दगी के तमाम शुअबों को अल्लाह जल्ल ल शानुहू के अवामिर और नबी-ए-करीम के तरीके पर लाने और काम करने वालों में यह सिफात पैदा करने के लिए छः नम्बर मुकर्रर किये गए, उस वक्त के अहले हक उलमा व मशाइख ने ताईद फ़रमाई, उन के फ़र्ज़न्दे रशीद हज़रत मौलाना मुहम्मद यूसुफ रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी दाईयाना व मुजाहिदाना जिन्दगी इस काम को इसी नहज पर बढ़ाने और इन सिफात के हामिल मजमा को तैयार करने की कोशिश में खपा दी, इन आली सिफात के बारे में हदीस, सीरत और तारीख़ की मुतबर कुतुब से रसूलुल्लाह (S W ) और सहाबा-ए-कराम ॐ की ज़िन्दगी के वाकिआत नमूने के तौर पर “हयातुस्सहाबा " की तीन जिल्दों में जमा किए। यह किताब उन की हयात ही में वहम्दुल्लिाह शाय हो गई।
मौलाना मुहम्मद यूसुफ़ रहमतुल्लाह अलैह ने इन सिफात (छः नम्बरों) के बारे में मुन्तखव अहादीसे पाक का मजमूआ भी तैयार कर लिया था, लेकिन उनकी तर्ती व तकमील के आख़िरी मराहिल से कबल ही वह इस आलमे फ़ानी से आलमे जाविदानी की तरफ रिहलत फ़रमा गये। ا نا للهّٰ وانا ا ليه راجعون मुतअदिद्द खुद्दाम व रूफका से हज़रत रहमतुल्लाह ने इस मजमूए की तैयारी का ज़िक्र फ़रमाया और इस पर हज़रत रहमतुल्लाह अलैह, अल्लाह जल्ल ल शानुहू के शुक्र का और अपनी खुशी
का इज़हार फरमाते रहे। अल्लाह तआला ही जानता है कि उन के दिल में क्या-क्या अजाइम थे और उस के हर-हर रंग को वह किस तरह उजागर कर के दिलनशीन करते, अल्लाह तआला के यहाँ इसी तरह मुकद्दर था, अब वह 'मुन्तख़ब अहादीस ' का मजमुआ हिन्दी तर्जुमे के साथ पेश किया जा रहा है।
इस किताब के तर्जुमे में आसान, आम फ़हम ज़बान इख़्तियार करने की कोशिश की गई है। हदीस के मफ़हूम की वजाहत के लिए बाज़ मकामात पर कौसैन की इबारत और फ़ायदे को इख़्तिसार के साथ तहरीर करने की सई की गई है। चूँकि मौलाना मुहम्मद यूसुफ रहमतुल्लाह अलैह को अपनी किताब के मुसव्विदः पर नज़रे सानी का मौका नहीं मिला था इसलिए इसमें काफी मेहनत करनी पड़ी जिसमें मतने हदीस की दुरुस्तगी, रिवायते हदीस की जिरह व तअदीले हदीस की तस्हीह व तहसीन, व तज़ईफ, शरह ग़रीबुलहदीस वगैरह भी शामिल है।
इस तमाम काम में बकुद्रे इस्तिता अत एहतियात को मलहूज़ रख गया है और उलमा-ए-कराम की एक जमाअत ने इस काम में भरपूर इयानत फ़रमाई है। अल्लाह जल्ल त शानु उनको बेहतरीन जगाये खेर अता फरमाये, बशरी लगुज़िशें मुम्किन हैं हज़राते उलमा से दरख्वास्त है कि जो चीज़ इस्लाह के लिए जरूरी ख्याल फरमायें उससे मुत्तल फरमाएँ ।
यह मजमूआ जिस मकसद के लिए हज़रत जी रहमतुल्लाह अलैह ने मुरतव फ़रमाया था और उसकी अहमियत को जिस तरह हज़रत मौलाना सैय्यद अबुल हसन अली नदवी रहमतुल्लाह ने वाज़ेह फ़रमाया उस का तकाज़ा यह है कि इसको हर किस्म की तर्मीम और इतिसार से महफूज रखा जाए।
हक तआला जल्लल शानहू ने जिन आली उलूम की तबलीग व इशाअत के लिए हज़रात अम्बिया-ए-किराम अलैहिस्सला वत्तस्लीम को ज़ारिया बनाया उन उलूम से पूरा फायदा उठाने के लिए ज़रूरी है कि उस इल्म के मुताबिक यकीन बनाया जाए। अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त के आली फरमान को पढ़ते और सुनते वक्त अपने आप को कुछ न जानने वाला समझा जाए। यानी इन्सानी मुशाहिदा पर से यकीन हटाया जाए और गैब की ख़बरों पर यकीन लाया जाए। जो कुछ पढ़ा और सुना जाए उसे दिल से सच्चा माना जाए जब कुरआने करीम पढ़ने या सुनने बैठा जाए तो यूँ समझा जाए अल्लाह तआला मुझसे मुखातव हैं, और जब हदीस शरीफ

