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पढ़ने या सुनने बैठा जाए तो यूँ समझा जाए कि रसूलुल्लाह ( s W)मुझसे मुखातब हैं,
कलाम को पढ़ते और सुनते वक़्त साहिबे कलाम की अज़मत जितनी तारी होगी और
उस कलाम की तरफ जितनी तवज्जोह होगी उसी कुदर कलाम का असर ज्यादा
होगा। क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह ( S W) से इर्शाद फरमाया :
तर्जुमा :
और जब यह लोग इस किताब को सुनते हैं जो रसूलुल्लाह ( S W) पर नाज़िल
हुई है तो (क़ुरआन करीम के तअस्सुर से) आप उनकी आँखों को आँसूओं से बहता
हुआ देखते हैं, इसकी वजह यह है कि उन्होंने हक़ को पहचान लिया।
दूसरी जगह अल्लाह तआला ने अपने रसूल (S W) से इर्शाद फरमाया :
(الزمر : ۱۸،۱۷)
आप मेरे उन बन्दों को खुशख़बरी सुना दीजिए जो इस कलामे इलाही को
कान लगा कर सुनते हैं फिर उसकी अच्छी बातों पर अमल करते हैं यही लोग हैं जिन
को अल्लाह तआला ने हिदायत दी है और यही अक़्ल वाले हैं।
(जुमर)
एक हदीस में रसूलुल्लाह ( S W)ने इर्शाद फरमाया :
हज़रत अबूहुरैरा (R Z) रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह (S W) ने इर्शाद फरमाया: जब
अल्लाह तआला आसमान में कोई हुक्म नाफिज़ फरमाते हैं तो फरिश्ते अल्लाह
तआला के इस हुक्म के रोअब व हैबत की वजह से काँप उठते हैं और अपने परों
को हिलाने लगते हैं और फरिश्तों को अल्लाह तआला का इर्शाद इस तरह सुनाई देता
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है जैसे चिकने पत्थर पर जंजीर मारने की आवाज़ होती है, फिर जब उनसे घबराहट
दूर कर दी जाती है तो एक दूसरे से दरयाफ्त करते हैं कि तुम्हारे परवदिगार ने क्या
हुक्म दिया? वह कहते हैं कि हक बात का हुक्म फरमाया और वाकई वह आलीशान
है, सब से बड़ा है (यूँ जब फरिश्तों पर हुक्म वाज़ेह हो जाता है तो वह उसकी तामील
में लग जाते हैं।)
एक दूसरी हदीस में इर्शाद है :
हज़रत अनस ( R Z) फरमाते हैं कि नबी-ए-अकरम
( S W) जब कोई अहम बात
इशाद फरमाते तो उस को तीन मर्तबा दोहराते ताकि उसको समझ लिया जाए।
इसलिए मुनासिब है कि हदीसे पाक को तीन मर्तबा पढ़ा जाए या सुनाया जाए।
ध्यान, मुहब्बत और अदब के साथ पढ़ने और सुनने की मश्क़ हो। बातें न की जाएँ।
बावुज़ू दो ज़ानू बैठने की कोशिश हो, सहारा न लगाया जाए। नफ्स के मुजाहिदे के
साथ उस इल्म में मशगूल हों। मक़सद यह है कि दिल क़ुरआन व हदीस से असर
लेने लग जाए। अल्लाह तआला और उन के रसूल ( S W) के वादों का यक़ीन पैदा होकर
दीन की ऐसी तलब पैदा हो कि हर अमल में रसूलुल्लाह
( S W)का तरीका और मसायल
उलमा हज़रात से मालूम कर के अमल करने वाले बनते चले जाएँ।
अब इस किताब की इब्तिदा उस खुत्बे के इब्तिदाई हिस्से से की जाती है जो
हज़रत मौलाना मुहम्मद यूसुफ रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी किताब
के लिए तहरीर फ़रमाया था ।

