. हजरत इब्ने अब्बास(रजी अल्लाहू तआला) रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह (सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने अबूज़र(रजी अल्लाहू तआला) से इर्शाद फ़रमाया: बताओ ईमान की कौन-सी कड़ी ज़्यादा मजबूत है
हजरत अबूजर(रजी अल्लाहू तआला) ने अर्ज किया : अल्लाह तआला और उसके रसूल को ज़्यादा इल्म है
(लिहाजा आप(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ही इर्शाद फ़रमाएं) आप(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने इर्शाद फ़रमाया: अल्लाह तआला के लिए बाहमी तअल्लुक़ व तआवुन हो और अल्लाह तआला के लिए किसी से मुहब्बत हो और अल्लाह तआला ही के लिए किसी से बुग्ज व अदावत हो। (बैहक़ी)
हज़रत अनस बिन मालिक(रजी अल्लाहू तआला) रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने इर्शाद
फ़रमाया: जिस शख़्स ने मुझे देखा और मुझ पर ईमान लाया, उसको तो एक बार
मुबारकबाद और जिसने मुझे नहीं देखा और फिर मुझ पर ईमान लाया, उसको सातबार मुबारकबाद ।(मुस्नद अहमद)
हज़रत अब्दुर्रहमान बिन यजीद रहमतुल्लाह
अलैह फ़रमाते हैं कि हजरत अब्दुल्लाह (रजी अल्लाहू तआला) के सामने कुछ लोगों ने रसूलुल्लाह (सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) के सहाबा और उनके ईमान
का तजकिरा छेड़ दिया। उस पर हज़रत अब्दुल्लाह(रजी अल्लाहू तआला) ने फ़रमाया: रसूलुल्लाह (सलल्लाहू अलैहि वसल्लम)
की सदाक़त, हर उस शख़्स के सामने, जिसने आप को देखा था बिल्कुल साफ़ और
वाजेह थी। उस जात की क़सम, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं कि सबसे अफ़ज़ल
ईमान उस शख़्स का है जिसका ईमान बिन देखे हो। फिर उसके सुबूत में उन्होंने ये
आयत पढ़ीः तर्जुमा : 'यह किताब है इसमें कोई शक व शुबहा नहीं, मुत्तक़ियों के लिए हिदायत है जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं। '(मुस्तदरक हाकिम)
हज़रत अनस बिन मालिक(रजी अल्लाहू तआला) ब्यान करते हैं कि रसूलुल्लाह(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने इर्शाद
फ़रमाया: मुझे तमन्ना है कि मैं अपने भाइयों से मिलता। सहाबा(रजी अल्लाहू तआला) ने अर्ज कियाः
क्या हम आप के भाई नहीं हैं? आप(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने इर्शाद फ़रमाया: तुम तो मेरे सहाबा हो
और मेरे भाई वे लोग हैं, जो मुझे देखे बग़ैर मुझ पर ईमान लाएंगे। (मुस्नद अहमद)
हज़रत अबू अब्दुर्रहमान जुहनी(रजी अल्लाहू तआला) रिवायत करते हैं कि हम रसूलुल्लाह(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम)
के पास बैठे थे कि दो सवार (सामने से आते) नज़र आए। जब आप (सलल्लाहू अलैहि वसल्लम)ने इन्हें देखा तो फ़रमाया : ये दोनों क़बीला किन्दा और क़बीला मज़हिज के लोग मालूम होते हैं यहां तक कि जब वे रसूलुल्लाह (सलल्लाहू अलैहि वसल्लम)की ख़िदमत में पहुंचे तो उनके साथ उनके क़बीला के और आदमी भी थे। रावी कहते हैं कि उनमें एक शख़्स बैअत के लिए आप(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम)के क़रीब आए। जब उन्होंने आप का दस्ते मुबारक हाथ में लिया तो अर्ज किया : या रसूलुल्लाह! जिसने आप की जियारत की, आप पर ईमान लाया और आपकी तस्दीक़ की और आपका इत्तेबाअ भी किया, फ़रमाइए उसको क्या मिलेगा?
आप(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने इर्शाद फ़रमाया : उसको मुबारकबाद हो। यह सुनकर (बरकत लेने के
लिए) उन्होंने आप के दस्ते मुबारक पर हाथ फेरा और बैअत करके चले गए। फिर
दूसरे शख़्स आगे बढ़े, उन्होंने ने भी बैअत के लिए आपका दस्ते मुबारक अपने हाथ
में लिया और अर्ज किया : या रसूलुल्लाह! जो आप को देखे बग़ैर ईमान लाए, आप
की तस्दीक़ करे और आपका इत्तबाअ करे, फ़रमाइये उसको क्या मिलेगा? आप(सलल्लाहू अलैहि वसल्लम)
ने इर्शाद फ़रमाया : उसको मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। उन्होंने भी आप के
दस्ते मुबारक पर हाथ फेरा और बैअत करके चले गए। (मुस्नद अहमद)
हज़रत अबू मूसा(रजी अल्लाहू तआला) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने इर्शाद फ़रमाया :
तीन शख़्स ऐसे हैं जिनके लिए दोहरा सवाब है, एक वह शख़्स, जो अह्ले किताब में से हो (यहूदी हो या ईसाई) अपने नबी पर ईमान लाए फिर (मुहम्मद सलल्लाहू अलैहि वसल्लम) पर भी ईमान लाए। दूसरा, वह गुलाम जो अल्लाह तआला के हुक़ूक़ भी अदा करे और अपने आक़ाओं के हुक़ूक़ भी अदा करे। तीसरा, वह शख़्स जिसकी कोई बांदी हो और उसने उसकी ख़ूब अच्छी तरबियत की हो और उसे ख़ूब अच्छी तालीम दी हो, फिर उसे
आज़ाद करके उससे शादी कर ली हो, तो उसके लिए दोहरा अज्र है। (बुख़ारी)
फायदा : हदीस शरीफ़ का मकसद यह है कि उन लोगों के आमालनामे में हर अमल का सवाब दूसरों के अमल के मुक़ाबले में दोहरा लिखा जाएगा। मसलन, अगर कोई दूसरा शख़्स नमाज़ पढ़े, तो उसे दस गुना सवाब मिलेगा और यही अमल उन तीनों में से कोई करे तो उसे बीस गुना सवाब मिलेगा। (मज़ाहिरे हक़)
